संंगीत और मैं

कुछ  ऐसा िरश्ता है मेरा संंगीत से.
मेरे जज़बात खामोशी मेंं िलपट जाते हैं ,
और संंगीत  उन्हें़ शब्दों में
िपरो के मेरे िदल के करीब ले जाता है.

मैं कोई बहुत अच्छी गाियका तो नहीं,
िफर भी गाती हूँ.
िजतनी मुझे संगीत से मुहबबत है,
उससे कई  ज़्ायदा शायद
संगीत को मुझसे इश्क है.
तभी तो मैं जब बेसुरों की तरह गाती हूँ
तब संगीत भी मेरे साथ
मुझे सही सुरों की समझ देने वासते
मेरे संग गाता है.

शायद  इश्क कुछ ज़्यादा ही है
संगीत को मुझसे.
तभी तो मेरी  उदासी और खुशी
या कभी कुछ ऐसे जज़बात
िजनका  मुझे भी नहीं पता होता
उन्हें भी शबद्ों में िपरो देता है.

कभी-कभी मन
कुछ  उदास सा हो जाता है
और िफर संगीत भी  उन्हें
शबदों में बयान नहीं कर पाता.
मन िफर  संगीत से कुछ
खफा सा हो जाता है.
पर संगीत की किशश
मुझे अपनी ओर खींच ही लेती है.

आिखर कोेई अपने मुहब्बत से
ज़्यादा देर दूर् रह भी कैसे सकता है ?

कुछ  ऐसी होती है
मेरी और संगीत की गुफ़तगु.
मेरी और संगीत की मुहब्बत| 🙂

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